रविवार, 29 सितंबर 2013

आलमारी का भूत

बात सन 1991 की  है  । हमने उस समय नया मकान लिया था । जिस  पंजाबी परिवार का था वह मकान वे लोग कनाडा  शिफ्ट हो गये थे  । काफी फर्नीचर छोड गये जिनमे एक सोफा , एक पलंग , डैनिंग  टेबल और चार कुर्सिया । एक लोहे का अलमारी भी ... सलेटी  जंग  लगी   दिखने में ही बेहद    पुरानी । हम  अपने  पुराने  घर का सामान  सेट े करने में लगे थे । मै  ममी   छोटी बेहेन अंजू और भाई रोबिन । तभी  रोबिन  दुसरे कमरे से   घबराया हुआ आया  बोला  - वहा  अलमारी से कुछ  आवाज आ रही है ।
मै शंकित हुइ  - अरे ऐसे ही आवाज आई होगी    चुहिया होगी । पर उसकी घबराहट कम न हुई
मै - अच्छा चल देखते है
मै धीरे कदमो से दुसरे  कमरे की तरफ  गयी दर मुझे भी लग रहा था । मै  रोबिन से बोली - आ देख कुछ नहीं है !!  पर  वो दरवाज़े की ओट से ही बोला -- नहीं ... नहीं  । तू देख क्या है
हिम्मत करके मैंने अलमारी का  हैंडल घुमाया पर  दरवाजा नहीं खुला
मै चिल्लाई - लॉक है , मम्~~मी  …   इस अलमारी की चाभी कहाँ रखी है ? 
मम्मी रसोई से ही बोली - देख बाहर  टेबल पर होगी

टेबल पे 3-4 चाभी के गुच्छे रखे थे ।  वह सब  ला के में  कोशिश करने लगी की किसी तरह अलमारी खुले और पता चले । सब चाबिया देख ली पर अलमारी न खुली ।
मम्मी ने आवाज दी - चलो चाय पी लो  थक गये होगे बाद में और काम भी हैं । हमने सोफे पलंग सीदा किया गद्दी बिछाये और थक के वहीँ लेट गए । मम्मी रात के खाने में जुट गयी । रोबिन मेरे पास लेटा हुआ बोला  - इसी अलमारी के  डर से वो लोग  कनाडा भाग गये होंगे ... है ना  सोनिया !
मै डांट  कर बोली - चुप  कर  । फालतू में खुद भी डर रहा  है मूझे भी डरा रहा है
अंजू - क्या हुआ ?
मैं -  अरे कुछ नहीं  इसको अलमारी से कूछ आवाज आया तब से पागल हो गया है  ।। हुह्ह
रात खाने के बाद  रोबिन अंजू से बोल - तू मेरे पास सोइयो मुझे डर लग रहा है ।
और वो  अंजू का हाथ पकड़ के सो गया । पर मुझे नींद नहीं आ रही थी । सोचने लगी  क्या हो सकता है । उन दिनों ब्योम्केश बख्शी का सीरियल बड़ा  चल रहा था ।  कोई   भूत काले कपड़ो वाला लम्बे नाखुनो वाला अंदर से खरोच रहा है की कोई बाहेर निकले आजाद करदे ।  .... अपनी सोच से मै खुद   घबरा कर चादर मुह तक उड़स कर सो गयी   
अगले दिन  मम्मी सुबह चिल्लाई - अरे उठो स्कूल नहीं जाना ? चलो एक एक कर नहाने जाओ
अलमारी बाथरूम के  पास हीखड़ी  थी ।रोबिन के कान में मै बोली - भाई  भूत अलमारी से निकल के आएगा जब तू नहायेगा  शावर के पास ..... हु हाहाहा
वो रोया - हु हु मम्मी..... देखो सोनिया मुझे  डरा रही है
मम्मी - चुप होजा भूत वूत कुछ नहीं होता सोनिया.. मरूंगी तुझे मै अगर इससे डराया तो    !
वो आँखें दिखाती हैं तो मै  हँसती हु । चल  मै जाती हू ।  नहा के तैयार हुए  और स्कूल को भागे । दोपहर को छुट्टी हुई तो फर वही अलमारी और  उसका भूत दिमाग में तैरने लगा । आखिर खुलती क्यों नहीं ?? मम्मी भी कोशिश करने लगी बोली -  अरे है क्या इस मुई अलमारी में ?? पर जोर अजमाइश   बेकार रही
मम्मी पुरानी पड़ी है लॉक में जंग लग गयी है   - मैंने कहा
हम्म तेरे पापा  चाभी वाले को लेते आयेंगे फोन करदे
- मम्मी ऐसे बोल के  खाना परोसने चली गयी
मै फोने पर पापा को बोल के खाने बैठी तभी
खड़क खडक ।।। आवाज  आई   हम सब   बच्चे चोंक गए ..
एक चुहिया  इतनी आवाज नहु कर सकती  .... अब डरे बढ़ने लगा था ।
अंजू - मम्मी  उह्ह उह्ह   हमको यहाँ नहीं रहना वापिस चलो पुराने घर
मम्मी ने समझाया - बेटा कुछ नहीं है  तुम  बेकार डर रहे  हो
दुसरे कमरे मे मम्मी पापा को  फोने पर धीरे से बोली - सुनो जी । कोई  पंडित को लेते आना हवन रखवा  लेते है
उधर से  हां कहे होंगे पापा
शाम हवन की तयारी होने लगी । चावल रोली मोली सामग्री फल और हवन कुंड में लकड़िया  रख के  पंडित जी और हम  सब बैठ गए   हवन पूरा हुआ तो अंजू रोबिन बाहर खेलने  चले  गए ।  मम्मी  पंडित जी  से बोली  - आप  भूत बाधा भी शांत करते हैं क्या पंडित जी ? 
पंडित जी  हां में सर  हिलाए और बोले - हाजी पर उसके 5000 लगेंगे ।
पापा  - क्या बात है ? कैसा भूत  कैसी  बाधा ?   ये 5000 किस चीज़ के  ? आपसे 500 में बात हुइ थी न !
मम्मी पापा को टोकी - अरे नया घर है ये अल्मारी  कब से बंद पड़ी है  इसको या तो बाहर  फेंकवाओ  या बाधा उतरवा कर ही  खुलवाओ
पापा परेशान - उसमे कुछ नहीं है  कपड़ो के सिवा  हरमिंदर जी ( माकन के पिछले मालिक ) से बात हो चुकी है । तू  बेकार में भूत   भूत  कर रही है
पंडित  बीच में ही - मै जाऊ या रुकूँ ?
मम्मी - आप रुकिए न  ।
फिर पापा की तरफ - बात को समझिये बच्चो का घर है 4 पैसे फालतू चले जाये   क्यों मुसीबत मोल लेते हैं । एक बार  करवा लेने दो न
पापा -(  सोच कर  )   ठीक है पंडित जी 200   से एक रूपया   ज्यादा नहीं  दूंगा    ।
पंडित - हैं !!!  श्रीमान जी  1000 तो  होते हैं कम से  कम 
पापा - वो आप सोच लो  वरना चलो छोड़  आऊ 
पंडित जी - अच्छा 500 में कर दूंगा
पापा - ठीक है   क्या क्या लाना है ?
पंडित  कागज़ पर लिख के दे देते हैं और पापा सामान लेने चले जाते  हैं
मम्मी अलमारी की तरफ इशारा करती  हैं - वो अलमारी है  । मुई ने कल से  चैन  नहीं लेने दिया
पंडित - देखता  हू  । मैंने तो भूत   डायन सब से पानी भरवा रखा है । आप फिकर न  करें
थोड़ी  देर में पापा सब  सामान ले आये । थाली में रोली भर के राखी बिच में एक  निम्बू   लोटे में कलावा बंधा पानी से भर  के अलमारी के पास रख दिया
इक कला कपडा  उसपर  नारियल    सिन्दूर छिड़क कर पंडित जी  - बच्चो को बाहर  भेज  दो  

मम्मी मुझे जाने का  इशारा करती है   । पर मै बहार की तरफ जाकर  ओट से  
देखने लगती हु 
पंडित मंत्रो जाप शुरू करते  हैं   पापा  मम्मी  पास खड़े चुपचाप  देख ते  रहते है
पंडित जी - जाइये  चाभी वाले को   बुलाइए 
पापा  बहार की तरफ  आते देख में  दूसरी  तरफ    छुप गयी । चाभी वाला  आया और अलमारी में बदल बदल के चाभी  घूमने  लगा
खड़क ..... खुली !
पंडित  सामने  खड़ा  और जोर से   मंत्र पढने लगा
चाभी वाला भी  डरा   धीरे से  दरवाजा  खुला तो
हाय ।। टन से  थाली  गिर गयी और   पंडित जी  चिल्लाये 
एक  मोटा  चूहा  पंडित जी पर   उछाल के किसी कोने में  भाग  गया
पापा  जोर जोर से  हसने लगे   - हाहाहा
देख  भूत पकड़ा  गया !
मम्मी खिस्याई - हुह्ह 
मै भी ओट से निकल के  हँसने  लगी ।
पापा  - लो  पंडित  जी   500   रूपये और चलते  बनो
अज्जी बात  तो हज़ार रूपये की हुई थी 500 तो हवन के हुए बस !  - पंडित

पापा - तो  बात  भी  भूत भगाने की हुई थी चूहा भागने की नहीं 
पंडित जी  मुह  लटका कर चल  दिए
मम्मी  उनको रोकी - अजी ऐसा क्या  करते हो  200  रूपये  हाथ में पकडिये और ख़ुशी ख़ुशी जाईये
पंडित जी मारे जी से मुस्कुराये और चले  गए   ।

रोबिन अंजू  डरे डरे से घर आये और सारा किस्सा सुन के कई दिनों तक लोटपोट  होते  रहे
पर आज भी रोबिन  उस   कमरे में नहीं सोता  जहाँ अलमारी  रखी हुई है  ।


                    **** इति ****

शुक्रवार, 2 अगस्त 2013

Thaggu halwaai ka beta Khurafati Sonu

Scene 1

Azad nagar sen. Sec. School

Xth Class me maths teacher naam leker bacho ke 2nd  term. Ke result announce kar rhe hn
Ravi..... 100 mese 40 .. pass

Ravi uth  kar sheet le leta h

Samir.... 45 ... pass

Gopal.... 42..... pass

Sonu ..... 35 ..... fail !!

Sonu ka dil dhakk..... ye kya hua
Usse apne baap ki yaad aane lgi
Beta aaj to teri dhulaai pakki

"Abbe kahan kho gya... le sheet leja
Apne baap ke sign krwa kar laiyo " teacher chillaya

Sonu ne uthker mare man se sheet le li . Sare period udaas baitha rha .
Ghanti baji .... tannn tannn tannn . Period khatam hua to wo teacher ke piche ho lia .
Sir...sir ...

Kya hai bey ?

Sir.... papa ki dukaan pr kal raat hi taaze gulabjamun baney hain. Sham ko  aap  kaho to le aau ? 

Sir ke muh me paani aagya fir akadtey  huey bole .. haan ... thik h thik h...le aaiyo 20 laiyo .. aikdam garam

Ji... ji.. - keh kar sonu wapis class ko mud jata hai .

Scene 2

Sonu ka ghar

Sonu - papa me 2nd term me pass ho gya hu . Master ji ko gulabjamun khila aau ?

Thaggu - arre khush kitta oye !!  Ja ja abhi bandh deta hu garmaa garam !

Sonu - 20 bandhna ... bde paitu hn wo . Unko 8-10 se kuch nai hona

Thaggu - haan... le lejaa . Or aaj tere liye bhi gajar ka spcl halwaa bnata hu mavey daal key :D

Sonu khush hoke master ke ghar bhag leta h.
Ting tong ... ghanti bjata h
" haanji ! Kya chahiye ? "

Aik sunder ladki sonu ke samne khadi thi.. sonu sann .
" ji ... wo  hari sir .... "

" Haan .. yahi rhte hain ...kya kaam hai ? "

" ye gulabjamun de dena unko .. bolna Sonu  ne diye hn "

"Thik hai " keh kar ladki darwaja band kar deti h  .

Sonu full ke kuppa !  Yaar !! Ye us gadhey ke ghr....
Ujadey chaman ke yahan gulab !!

Sonu  khush hota hua ghr wapis chal padta h

Scene 3

School

Class me maths ki class chal rhi hai.. sonu master ko ruk ruk kar dekhta hai jaise bhuka kutta apne malik ko .

Tann tann tann class khatam hoti hai . Sonu sir ke piche ho leta hai
Sir staff room me jaise hi kursi par baith.te hai
Sir .. keh kar sonu kandey dabaane lagta h
"Kya hai bey ! "

"Sir ...  Gulab jamun kaise lage ?"

" Haan haan achey they "

"Sir .... sir... mai keh rha tha ... mere thode number badha dete ... to ..."

"Abbe chal marunga chadi se ... ja yhn se !! "

"Sir .. suno to ! " or kandhe jor jor se dabate huey sonu minnat karta h
" sir ... plz .... plz  4-5 number me kya jayega ...  aap bolo to apke liye halwa banwa lau... man jao  na sir ! "
Teacher ke muh me paani aaya " chal thik h ... badha dunga .. par kisi se kahiyo nai ... wrna saale maar maar ke murga bana dunga ! ... or haan  kal aik kilo le aaiyo .. gher pr samjha !! "

" ji ... ji bhot badhiya " sonu khush hota hua  class wapis ho leta h

Uski aankon me to sir ki beti ki foto tair rahi thi ...

Yaar.....  kl jaunga to uska naam pataa karke hi aaunga

Agley din Sonu jldi uth kr ftafat tayaar hua or hath me
moongdal halwa liye master ji ke gher ki taraf chal dia

Raste me ik gulab dekha to tod lia or apni shirt me chupa lia

'TING TONG '  ganti bajai

"Arre tum .. ! " ik surili aawaj ne sonu ko hila dia ..

"Ji ..... ye aapke liye " or kehte hue  usne halwa de dia... or jaise hi shirt se gulab nikal ke dene lga to awaj aayi

" kon hai  tannu ?? " masterji piche se bolte hue darwaje tak aa gye
Tannu unko dekh ke piche huii or boli " apka student aaya h "

Masterji ne gulab dekh lia bole " oye ye kiske liye hai !!! "

" ji... ji .... arrrhh aapke liye teacher,s day aa rha hai na "  jabarjasti  muskuraya sonu

" thik hai .. jaa tu school jaiyo seedha ! Warna aate hi teri class lunga " teacher ne gulab le lia or dhadaam se darwaja band kar lia .

Sonu socha ... abbe yaar , aaj to gya tha ... meri hi arthi pe gulab chad jata ... par kuch to karna tha ... hmmm tannu <3  ..
Uska dil ye naam sochte hi or dhadakne laga ... class me baitha par padhai me dil kahan tha ..

Pehla nasha pehla khumaar
nayaa pyar hai naya intzaar
Karlun main kya apna haal
Aie dile bekaraar mere dile bekaraar
Tu hi bataa <3

Jaise duniya rangeen ho gyi thi or sab slow motion me chal raha tha
. Usne tannu ka school pta laga lia tha chutti hone pr gate pr pahuch bhi gaya tha . Intzaar... intzaar
Wo nazar aayi .... fir dil me laddu footne lage ....
Par  ye kya ! Wo thodi duri par khade ik bike wale ko dekh kar muskurai  .. or pass ja ke kuch bol ke bike pr baith gyi or ... furrr

Sonu ka dil tut gaya :(  .... isse acha me fail hi ho jata
Itna dard tab nahi hua jitna aaj hua
Tuta dil leker jaise taise ghar aa gya

Class me ladke usse poochte " abbe kya huaa h ... muh latka ke rhta hai ! kya chakkar hai ?  "
" kuch nai yaar :( .... wo masterji ki ladki hai na ... wo "
Ohhoo ... abbe tu bhi khn dil lagaa baitha ... tu bhi na ... wo to phle hi kisi ladke ke sath h
Wo Adarsh nagar ke public school ka londa "
Sonu " hmmm... janta hu dekh chuka hu "
" tabhi ... ! .. arre chor.. ladkiyo ki kys kami h humko ? " keh ke dost chla gaya
Par dillagi kahan choot.ti hai
Din mahine aise hi jate rahe .. Final exam huey  or jaise  socha tha ... sonu fail ho gya

Sonu ke pitaaji chillaye " arre itne maal khilaye fir bhi fail kr dia us master ne !!! Awara tu bhi to mehnat nai karta !
Chal ab kal se dukaan par baith mere bas ki naa hai or paiss funku.

Sonu ko man maar kar pitaaji ki baat maan.ni hi padi . Agle din se dukaan jana shuru kia. Poori dukan rang birangi chashni se lipti mithaiyon se bhari padi thi par sonu ka dil uchat ho chuka tha . Uske dilo dimag se tannu jati hi nahi thi . Bas saman dena paise lena .. sham ko hisaab pitaji ko de dena .... yahi routine ban gyi .

Ik din  jab aise hi dukan par baitha tha to ik surili aawaj uske kaano me takraai
" suniye !  Ye chamcham kaise di ? "

" ji.... 80 rupiye kilo " sonu ko dhyan aaya .. arre ye to pados wale sharma uncle ki beti mannu h
Wao badi cute h ... meri nazar kyu nai padi ab tak isper !! Issi hairani me tha ki wo boli
" ok ... 1 kilo tol do pls " or muskurate huey usne sonu ko paise thama diye
Sonu ne bhi fataafat  chamcham toli or dibbey me pack kar ke mannu ko de di .
Mannu Thanx bol kar muskurati hui chali gayi or sonu ke dil  ka guitaar firse bajne lagaa  . Tannu nahi to mannu hi sahi
Usse ehsaas ho rha tha jaise ik nayaa mausam uski zindgi me dastak de gayaa hai ♥

                     ◇ ♥◇ THE END ◇♥◇

बुधवार, 21 मार्च 2012

एक रानी की कहानी


रानी 
इक बार एक राजा था और एक रानी। राजा  की उम्र अधेड़  उसकी रानी प्यारी सुंदर 
हसमुख दोनों चाहते इक दुसरे को बहुत पर राजा जब अपने राज्य के कार्य  मउलझा रहता तो रानी का मन न लगता .
वो कभी सखियों के साथ खेलती ठिठोली करती पर अंदर से राजा को याद करती रहती .
राजा भी मजबूर अपनी तरफ से हर संभव कोशिश करता .पर खुश नहीं रख पता उसे ...
दिन महीने साल बीत गये  ...राजा की  उम्र रानी से कई साल बड़ी भी थी .रानी को पर इससे फर्क नै पड़ता था वो तो बस उनके साथ समय चाहती थी जो राजा नहीं दे सकता था 

सावन का मौसम था चारो तरफ हरियाली थी पेड़ पौधे झूम रहे थे पंछी कोलाहल करते थे रानी की सखिया खिलखिला रही थी रानी इक मोर को सहलाती हुई खिड़की के पास बैठी थी वो दूर के नज़ारे देख रही थी.
दूर कही उसे इक छवि दिखाई दी इक पुरुष की ... वह्पुरुष दूर वन में टहेल रहा था अपने मित्रो के साथ...
रानी मुड़ कर  सखी को बुलाती हैं  "शमा !!! ये कौन हैं ??हमारी सीमा में कैसे आ रहे हैं ?इनको पता नहीं ये हमारा राज्य है!!"
शमा- "आप चिंतित न हो रानीजी में अभी सिपाही को भेजती हु ." ये कहकर सखी किले के द्वार की तरफ जाती है.और सिपाही को आगाह करती है 
दूर से रानी सब देख रही होती है .सिपाही उन लोगो को समझा कर जाने को कहता है. वह पुरुष ऊपर रानी को देखता है .रानी उसे देख कर मोहित हो जाती है..
जब वह चले जाते हैं तो रानी सिपाही को बुलवाती है. "वे कौन लोग थे ? क्यों हमारी सीमा में प्रवेश कर रहे थे? "
सिपाही- वे पडोसी राज्य के राज कुमार थे वन में टहेलते हुए रास्ता भूल गये थे रानीजी 

रानी- ओह अच्हा...क्या नाम था उनका...

सिपाही- जी पता नहीं 

रानी-ठीक है तुम जाओ.

रानी को उसकी छवि उसके रूप और उसकी आँखों ने आकर्षित कर लिया था वह जानती थी यह गलत था पर आकर्षण कहाँ किसी की मानता है.
वह अगले दिन सखियों के साथ पडोसी राज्य खरीदारी के लिए गयी .कई बाज़ार थे वहां कपडे जेवर सजावटी सामानों से सजे धजे पर उसकी निगाहे तो राज कुमार को ढूंड रही थी . क्या काश ऐसा हो सकता है वो फिर टहेलते हुए नज़र आ जाये?? रानी मन ही मन सोची... 

कई घंटे गुजर गए रानी ने कुछ न ख़रीदा .सखी ने पुछा" रानीजी तबियत तो ठीक है न? चाहिए वापिस चलें शाम भी होने चली "
रानी बुझे मन से बोली"ठीक है चलो"
रस्ते में उसे फिर वही छवी दिखी वही आँखें  वही सावली सूरत रानी मुस्कुरा उठी...
बिना कुछ सोचे उसकी तरफ बढ़ गयी ..."आप वही हैं न उस दिन भूलवश हमारी सीमा में आ गये थे ??"

राजकुमार बोला" जी ...मैं वही हु गलती से उस तरफ आ गया जिधर आपका महेल है. क्षमा करे ..."
रानी - " क्या नाम है आपका ?"
राजकुमार- " क्षितिज कुमार "
तभी सखी ने रानी को आवाज दी -रानीजी चलिए...देर हो रही है..
और रानी वापिस महेल लौट आई...वह तो वापिस आ गयी पर उसका दिल न आया वो वही कही रह गया था ..
बार बार उसी  की आँखे वह याद करती...और आहें लेती...
अब वह और भी उदास रहने लगी वह जानती थी इस प्रेम का कोई हल नहीं..
राजाजी लौट आये अपने काम से तो वह फिर उनके साथ मन बहलाने लगी पर राज कुमार की याद उसका पीछा न छोडती 
"ए सखी तू ही बता ..क्या करू मैं जो उसकी याद न आये ??"
"रानीजी उसका ख्याल छोड़  दो वह तो राज कुमार दुसरे राज्य में रहता है अगर राजा को पता चला तो जानती हैं न क्या होगा!!!"
रानी परेशां हो उठती...वह बीमार रहने लगी राजा ने कई वैध बुलवाए पर वेह ठीक ना हुई...
सखी भांप चुकी थी वह अगले दिन इक वैध को ले आई . 
"राजाजी ये दुसरे राज्य से आये हैं इनकी औषधि में जादू है पलभर में रानीजी ठीक हो जाएँगी "
राजा- ठीक है इनका बी उपाए देख लो....जाओ उनके कक्ष में ले जाओ 
सखी वैध को रानी के कक्ष में ले आई उनको देखते ही रानी की आँखे चमक उठी -अरे ये तो वही हैं क्षितिज कुमार !!
"जी मैं वही हु भेस बदल कर आया हु .आपकी सखी ने बताया मुझे की आप बीमार हैं तो मुझसे रहा नहीं गया .कैसे हैं आप ?? ये क्या रोग लगा बैठी है?
रानी रो पड़ी- पता नहीं में खुद अपने दिल के हाथो मजबूर हु मुझे क्या हुआ है मैं खुद नहीं जानती 
राजकुमार- (रानी का हाथ अपने हाथो में लेकर) बेकार बाते न सोचा करे इतनी सखिया हैं उनके साथ घूम फिर आयें या कोई दिल पसंद कार्य करें...
 "तुम हो मेरी दिल की पसंद "रानी हिम्मत करके आसुओं से भीगा चेहरा लिए बोली 
राज कुमार खामोश ....कुछ देर तक ऐसे ही ख़ामोशी रही 
"में आपकी भावनाओ की कदर करता हु पर ये मुमकिन नहीं है ..हाँ एक मित्र की भांति आपके साथ समय बिता सकता हु पर इससे ज्यादा आप उम्मीद न रखें"
ये कहकर राज कुमार रानी के कक्ष से चला गया 
"क्या कहा वैध ने ??" शाम को राजा ने शमा से पुछा
"जी राजाजी इनको घूमने फिरने की सलाह दी है "
"ठीक है ...इनको ले जाओ जहाँ इनका मन करे मुझे काम से जाना पड़ेगा उनको बता देना " ये कह केर राजा चला गया 
"रानीजी चलिए आपको पड़ोस के राज कुमार से मिलवा लाये "शमा चेह्की 
"तू पागल हुई है क्या !!"
"जी राजाजी से पूछ कर ही जायेंगे" ये कह क्र उसने सारा व्रतांत सुना दिया ...
वह दोनों पडोसी राज्य के इक बगीचे में आ गये "रुकिए में उनको बुलाती हु " ये कह कर शमा चली गयी 
राज कुमार की दूर से आती छवी देख रानी का दिल धड़का 
"कैसे हो आप? अब तबियत ठीक है न ?"
"हा में ठीक हु इक प्यारा सा वैध जो देखने आ गया "
"अच्हाजी तो उसी का कमल है जो आज आप कमल सी खिल उठी !!"
रानी शर्मा गयी उसने नज़ारे झुका ली 

"चलिए रानीजी बहुत  देर हो गयी "शमा दूर से पुकारी 
"अच्हा में जाती हु "
"आप फिर कब आएगी इस तरफ? "
" पता नहीं "
ये कह कर रानी वापिस लौट आई वह अब खुश थी बहुत खुश 
पर यह सोच केर फिर उदास हो जाती की ये तो बस कुछ ही पलों की ख़ुशी है न तो वोह मेरा हो सकता है न ही मैं उसकी ...
दिन महीने गुजर गए राज कुमार की कोई खबर न आई रानी भी उस राज्य की तरफ न गयी वो बस दूर खिड़की से देखा करती उसी बगीचे को और राज कुमार को याद करती ...
वह फिर बीमार सी होने लगी राजा भी उसपर ध्यान न देता 
सखी इक दिन रानी से बोली "कहो तो आपके वैध को ले आऊ?"
"नहीं शमा ये ठीक न होगा "
"रानी जी!! "
पहचानी सी आवाज से दोनों अचानक हतप्रभ रह गए 
"अरे आप? आप क्यों वापिस आ गये?? " ये वही राजकुमार था
"अगर राजाजी को पता चला तो अच्हा नहीं होगा आप लौट जाये!!"
राज कुमार- आपको देखे बिना कैसे चला जाऊ? येकह कर उसने रानी की कलाई थम ली 
आपसे मिलने के बाद मैं भी आपको चाहने लगा हु आप मेरे साथ चलिए ...
"नही.... ये नै हो सकता आप चले जाओ" कहकर अपना हाथ छुडा लेती है रानी 

"रानीजी राजाजी आ रहे हैं " शमा डरते हुए बोली 
"अच्हा मई अभी तो जा रहा हु पर अगली बार आपको लेकर ही जाऊंगा "
ये कहकर राज कुमार चला गया...
उफ़ ये क्या कह गया था राजकुमार ?? क्या सच में वो दुबारा आकर रानी को ले जायेगा??
रानी सोच सोच कर परेशान.
"क्या बात है रानी तुम खुश होना ? नए वैध की दावा असर कर रही है न ?मुझे माफ़ करो में कुछ ज्यादा ही अपने काम में उलझा रहता हु तुमको वक्त नहीं दे पाता "राजाजी रानी को बाँहों में लेकर बोले 
"कोई बात नहीं आप मुझे चाहते है न ?"
"ये भी कोई पूछने की बात है!"
और वो दोनों इक दुसरे की बाँहों में खो गए 
पर दूसरी तरफ रानी जानती थी की राज कुमार जरुर उसे ले जाने को आएगा 
उसने सखी के हाथ चिठ्ठी लिख भेजी 
जो सखी राज कुमार को चुपचाप दे आई
राज कुमार पढने लगा....

प्रिय राज कुमार ....
तुम बहुत प्रिय हो मुझे पर में अपने राजा की रानी हु कोई राज कुमारी नहीं...
मैं जानती हु तुम भी चाहने लगे हो मुझे पर इस प्रेम का कोई मतलब नहीं है तुम्हारा कोई मुझसे भी प्यारी राज कुमारी इंतज़ार कर रही होगी ...
में एक कांच की की दीवार में बंद इक रानी हु जिससे न मई तोड़ सकती हु नाही तुम 
इसलिए  मुझे भूल जाओ

अपने राजा की रानी .

रानी अपने महल में चाँद को देखते ही सोचती है...राज कुमार के लिए कल की सुबह इक नई सुबह होगी और कभी न कभी मुझे वो भूल जायेगा ..
पर शयेद मैं उससे न भूल पाऊ...उससे बिचड़ने   के बाद अब हर मौसम पतझड़ का ही रहेगा ...
पर मुझे संभालना होगा ...
कई महीने बीत गए दोनों ने इक दुसरे की खबर न ली ..

इक दिन राजा ने आमंत्रण पत्र दिखाते हुए रानी को कहा "पडोसी राज्य के राजकुमार का विवाह तय हो गया है अगले महीने विवाह है हमे चलना है तयारी कर लेना रानी ..."
रानी आंसू छुपाते हुए बोली" आप हो आईएगा मैं नाही जा सकुंगी आपको तो मेरी तबियत पाता ही है कबी भी बिगड़  जाती है "
"ठीक है जैसे तुमको ठीक लगे "ये कहकर राजा चले गए और उनके जाने के बाद रानी बहुत रोई वह नही जानती थी ये आंसू ख़ुशी के थे या गम के 

                                                .....इति.......


















  
















गुरुवार, 6 अगस्त 2009

राखी की याद



अभी कल ही राखी थी.बोहोत सी यादें भी ताज़ा हुई मामाजी के घर की ,उनका छोटा सा घर तीन कमरे आँगन आँगन में हैण्ड पम्प .अभी मामीजी आवाज लगाएंगी और बोलेंगी .....
चलो बच्चों आ जाओ नाश्ता कर लो....
और हम सब मेज पर सजी थालियों पर टूट पड़े॥
मम्मी राखी से इक रोज़ पहले ही सब तयारी कर लेती थीं .मिठाई ,मठी,राखियाँ और सबके कपडों का बड़ा सा सूटकेस .मामाजी के घर भी सभी हमारा बेसब्री से इंतज़ार करते .अंतु पूनम हमे देख कर गले लग जाते.साल भर बाद जो मिलते थे .फ़िर बक बक का दौर चालू।
"अरे वाह ये सूट कहाँ से ख़रीदा?"
"तेरी मोतियों की माला कित्ती सुंदर है अंतु "
"क्या पढ़ रही हो आज कल ?"
"शाहरुख़ की नयी पिक्चर देखि??".....कई सवाल और धीर साड़ी बातें
मामीजी अंतु पूनम को टोकती"अरे बस भी करो कित्ती बातें करोगे..चलो ये खालो..वोह पीलो॥

अंतु"अरे इस बार मोदी मन्दिर जायेंगे ओके ...और जैन वाले की शिकंजी बी पीयेंगे "
हम हाँ में हाँ मिलाते ...
दुसरे दिन ही जींस फ्रोक्क वागाहरा पहेन क रेडी हो जाते .और पैदल पैदल निकल पड़ते।

थोड़ा भीड़ भाड़ वाला इलाका है मोदी नगर .वहां की आंबेडकर मूर्ति .आस पास के सब्जी फल वाले .हमे तो खैर आदत है.क्युकी दिल्ली की भीड़ बी कुछ कम नही .१०-१५ मिनट में हम मन्दिर पोहोच जाते...सब देख दिखा के

मन्दिर के अहाते में पिकनिक मानते .शिकंजी पी कर वापिस घर.
"पूनम तू खाना पकाना सीख रही है ना!!"में
पूछती "चल क्या क्या सीखा ?मुझे भी बता हम रसोई में साथ बनायेंगे!"
पूनम"अरे यार मलाई कोफ्ता सीखा है पर पहले उसके सामान खरीदे पड़ेंगे.."

ठीक है कल बाज़ार जायेंगे और फ़िर दिन में बनायेंगे"
ऐसे कितने ही हमने पकवान बनाये और खाए खिलाये .पर अब दोनों की शादी हो चुकी है। सब अपने अपने ससुराल में बस गयी हैं.कभी फुर्सत मिलती हैं तो बात हो जाती है.

चलो बाकी बातें फ़िर कभी......बाय

शनिवार, 7 फ़रवरी 2009

अम्मा


अम्मा ...नाम ज़हन में आते ही इक बूढी औरत की छवि बनती मटमैला सूट पहने सफ़ेद झीनी चुन्नी ओढे.खिचे हुए कानों में बड़ी से बालियाँ ,हाथों में इक इक कडा पुरानी जूती पहने हुए हमेशा नौकरों को काम समझते हुए या ओखली में मिर्च,धनिया कूट ते हुए .साल में इक या दो ही बार मुलाकात हो पाती उनसे या तो जब छुट्टियाँ हों या फ़िर जब उनके बीमार होने की ख़बर मिले .मेरठ में चाचाजी के साथ ही मन लगता था उनका या कहें अपनी चंपा चमेली के साथ ..उनकी गाय भेंसें ।
पापा को जब भी ख़बर मिलती फ़ोन पर हमको भेज दिया करते कहते" जाओ तुम देख आओ ,मेरी राम राम कह देना।". मम्मी जानती थी लेने तो ख़ुद आ ही जायेंगे । इसी बहाने हमारी सैर हो जाती थी।
"कैसे हो अम्माजी ,फ़ोन पे बतलाया बोहोत बीमार हो!अब ठीक हो न!"मम्मी आदर्श बहु की तरह पैर छु कर हाल चाल पूछने लगी।
"आरी कुछ ना ......इन डाक्टरों की तो आदत ही है ज़रा सी परेसानी में डरा देवें हैं । तू कैसी है बचे देख कैसे सुखा रखे है सेहर में कुछ खाने पिणे को न मिलता क्या!!"हमारी तरफ़ देख कर वो अक्सर यही कहती और फिर शुरू हो जाता अंतहीन बातों का सिलसिला .हम और चचेरे बहेन भाई आपने अपने खेलों में लग जाते ।
पड़ोस में ताऊ ताईजी भी रहते थे पर पापा और उनमे बोलचाल नही थी इसलिए वहां जाना मना था .फिर भी ताई हम बच्चों को आवाज देकर बुला ही लेती .उनकी विशालकाय कोठी में हम सहमे से ही रहते ,४ हालों की कोठी और बाहर लॉन। विक्की (उनका बेटा) जो मेरी ही उमर का था हमे देख कर खुश होता , कहता चलो क्रिकेट खेलते हैं और घंटो क्रिकेट का दौर चलता रहता ।
"विक्की ....."ताईजी आवाज देती "जा अम्मा को बुला ला बाहर जाना है घर में रह लेंगी थोडी देर"

"अच्छा"कहकर विक्की चाचाजी के घर की तरफ़ दौड़ पड़ता ।
"चाचीजी नमस्ते ॥ कैसे हो आप ...बड़े टाइम पर आई नौचंदी का मेला लगा है देखकर जाना आप "
मम्मी हाँ में सर हिला देती ।
मेला क्या था अजीब ओ गरीब लोगो का जमावडा था मेजों पर रिबन ,काले धागे ,लोकेट काजल और न जाने क्या कुछ बिकता हुआ आगे इक छोटा सा मन्दिर जिसमे छोटी से देवी की मूर्ति ,हाँ हलवाई के पेडे स्वाद होते थे ।
तीसरे ही दिन पापा लेने आ जाते बस थोडी ही देर बातचीत कर के हम लौट आते अपने घर वापिस .हम तो लौट आते थे पर दिल नही लौट ता था कहते है न चीज़ थोडी हो तो ज्यादा चखने का मन करता है ।
५ साल बीत गए थे इस बार जो फ़ोन बजा तो अम्मा की मृत्यु की ख़बर मिली । मम्मी बता रही थी मेरे ससुराल के फ़ोन पर अरसे से बीमार तो थी ही राज को भी दुःख हुआ .वहां पहुचने पर देखा अम्मा का मृत शरीर चिर निंद्रा में सो चुका है पास ही में बुआ और चाची विलाप कर रही हैं कुछ देर बैठ कर मैंने रसोई का रुख किया छोटी चाची और मम्मी रसोई में बातें कर रही थी .
मेरी तरफ़ देख कर चाची बोली" कैसे है सोनिया...देख कैसे समय में आई तुझे चाय नाश्ता भी नही पूछ सकते "
"ठीक हूँ कोई बात नही "
बाहर बरामदे में अम्मा को ले जाने की त्यारी हो रही थी । "कहाँ ले जा रहे है!"राज धीरे से मेरे पापा से पूछे ।
"गढ़गंगा .... आप भी चलेंगे क्या!"
"नही देर हो जायेगी लौट ते हुए "राज ने न में सर हिला दिया
बाहर बस की दायीं तरफ़ मेरी ताईजी पर ध्यान गया .उमर के साथ चेहरा भी ढल गया था .मम्मी उनसे पूछ बैठी "आप भी जा रही हो क्या!!"

"नही ...कहीं जाना होता था तो अम्माजी को ही घर छोड़ जाती थी अब किसे छोड़ जाऊं"

उनके चेहरे के आते जाते भावों से मेरा मन खिन्न हो उठा ।"

चलो सोनिया " राज की आवाज सुन मैं अम्मा को आखरी बार राम राम कर भारी मन से मैंने अपनी गाड़ी की तरफ़ रुख कर लिया .

शुक्रवार, 30 मई 2008

पतझड़ के बाद

"काजल बेटी ड्राईवर गाड़ी ले आया ,बारिश रुकने के बाद चली जाना...!"माँ ने खिड़की के पास से काजल को कहा "नही माँ दीपक मेरा इंतज़ार करते होंगे "कहकर काजल गाड़ी मी बैठ गई और माँ बाबूजी से विदा ली बारिश अब कुछ कम हो गई थी मौसम सुहावना था .कार मैं बैठी काजल पुरानी यादों क पन्ने पलटने लगी।आज भी यह ड्रामा उसके साथ छाती बार हुआ .माँ बाबूजी तो सुबह से ही तयारी मे लगे रहे"अरे जल्दी करो,वर पक्ष से लोग आते ही होंगे...."फ़िर मिठास घोलती हुई मुझसे बोली.."बेटे कुछ मेकप बिंदी से चेहरा सवार लो जाओ तैयार हो जाओ" । और मैं मन मारते ही कमरे मे आ गई.सोचने लगी..क्या फायदा श्याम वर्ण कि वजह से ५ लोग तो पहले ही ठुकरा चुके हैं..ये बेईज्जती बार बार क्यों सहूँ???मुज्से छोटी दोनों बहनो कि शादी हो गई।इक मैं ही बोझ बन के रह गई हु पर अब नही ।इस बार भी जब वर पक्ष के लोग काजल को देख कर मुह्ह बिज्का कर चले गए तो काजल मे विरोध करने कि शक्ति आ गई "नही, बाबूजी अब और नही ,ये अपमान का बोझ मुज्से और नही बर्दाश्त होता ,आप मुज अभागिन को अगर कुछ समजते हैं तो अब मे नौकरी कर क ख़ुद जीवन यापन करुँगी।काजल ने इस बार किसी कि परवाह न करते हुए बुटिक मैं नोकरी कर ली.अब उसकी दिनचर्या और भी व्यस्त हो गई।अब उसे उदास रहने का समय भी ने था.बुटिक मे इक नई सहेली भी बन गई थी,विदुषी बहुत ही सरल और खुशमिजाज़ ,मानो कभी दुःख छू कर भी ना गया हो।"काजल आज तुम्हे मेरे घर आना ही होगा ,आज हम दोनों के विवाह कि प्रथम वर्षगांठ है."और ये कह कर विदुषी शर्मा उठी ।"थिक है जी आ जाउंगी और जीजाजी को क्या तोहफा दूँ!!"ये कहकर काजल हंस । शाम हो चली थी और पैदल ही मे विदुषी के दरवाज़े तक आ गई थी .खटखटाने पर इक साधारण ,साव्ले से व्यक्ति ने दरवाजा खोला ।विदुषी ने आगे आते ही कहा "आओ आओ काजल अंदर आओ.....बैठो "उन व्यक्ति के जाने पर काजल पूची "ये कौन थे विदुषी ??"काजल हैरान हुई इस विपरीत जोड़ी को देख कर कहने लगी"कहाँ तुम और कहाँ वे !! तुम इतनी सुंदर और स्मार्ट और.....""नही काजल,मन से जांचना चाहिए व्यक्ति को...चेहरे मे क्या रखा है..ये मुजे कॉलेज के दिनों से चाहते थे ,जब इन्होने हिचकते हुए प्रस्ताव दिया तो मे इनका प्रेम देख कर ना नही कह पायी।"यह सुनकर काजल विदुषी को देखती ही रह गई।पार्टी अच्छी खासी हुई ,वापिस आते हुए बी काजल के कानो मे विदुषी के अल्फाज गूंजतेरहे। कुछ ही दूर चली थी कि देखा इक स्कूटर वाला तेज़ी से रिक्शे मी बैठे वृद्ध दंपत्ति को टक्कर मारते ही निकल गया.दोनों संभल ना सके और नीचे गिर पडे। दोनों दर्द से कराह उठे ,सड़क पर ज्यादा भीड़ नही थी उस समय,काजल भागी हुई उनके पास पोहोची और सहारा देकर डॉक्टर के पास ले गई.क्लिनिक मी मरहम पट्टी करा कर हाल चाल पूछने लगी।वृधाने ने आशीर्वाद देते हुए बताया.."बेटी हम कुछ ही दूरी पे रहते हैं,तबियत ख़राब होने पर डॉक्टर को दिखा के वापिस लौट रहे थे कि अचानक.....""और कुछ ने कहिये आंटी जी ,मी आपको घर छोड़ देती ह."कह कर काजल उन्हें घर तक छोड़ने गई और विदा ली।फ़िर तो रोज़ ही woh उनके हाल चाल पूछने घर चली जाती .दोनों akeley ही रहते थे बेटा IAS कि training के लिए मस्सुरी मी ही था।इक रोज़ उसी ने ही दरवाज़ा खोला तो baraamdey मैं बैठी आंटी जी ने आवाज़ दी .."काजल ...यहीं आ जाओ ""काजल यही है मेरा बेटा ..deepak । कल ही ट्रेनिंग से लौटा है "काजल ने झिजकते हुए नमस्ते कहा।दीपक बोले "मैं आपका बोहोत आभारी हूँ ,आपने जो मेरी anupasthiti मैं इनका ख़याल रखा वरना आजकल कौन किसकी परवाह करता है "
इतने में आंटी जी चाय ले आई"बेटा,यही है मेरी बहु क्या तुमको पसंद है??"
दीपक मुस्कुराते ही कप उठाते हैं.काजल सकुचाते ही उठ टी है "मैं चलती हूँ"
"ये तो बताती जाईये मैं पसंद ह या नही?"
"मैंने मना कब किया!"और भागते ही दरवाजे से पार हो गई।
शाम को अंकल जी ने बाबूजी से फ़ोन पे बात कि और आने कि इच्छा जाहिर कि.बाबूजी फूले नही समाये और रिश्ता पक्का हो गया.हफ्ते भर मी धूम धाम से शादी भी हो गई.हर तरफ़ खुशी का माहोल था। सब काजल का नसीब देख कर अचंभित थे.माँ बाबूजी भी तारीफ़ करते नही थकते थे।
इतने मी ही ड्राईवर ने ब्रेक लगाई.काजल तंद्रा से जागी.दीपक दरवाज़े पर इंतज़ार कर रहे थे वह मन ही मन सोची यही तो मेरे बसंत हैं जो कई patjhaadon के बाद मेरी जिंदगी मी आए हैं.

मंगलवार, 27 मई 2008

Jo Hota hai ache ke liye hota hai

रजत अलमारी खोल कर जब अपने कपडे देखने लगे तो अनायास ही उनकी नज़र सुनीता की साड़ी पर चली गयी...आज १५ दिन हो गयी उससे गए पर अभी बी जैसे उसकी महक घर में रची बसी है...आशु की किलकारियाँ बरबस उसके कानो में पड़ जाती
"पापा मेरे लिए ट्रेन लाये!?"
दफ्तर से आते ही उसका यही सवाल होता/ सब कुछ ही तो ले गयी थी वो घर छोड़ के जाते वक़्त .ये साड़ी ही जाने कैसे रह गयी.
इसी साड़ी को सीने से लगाए रजत देर रात तक रोता रहा.कोन कहता है की अलग होने का दर्द सिर्फ ओरतें झेलती हैं.पर कुछ बी तो सुना ने उसने..
' कीत्नी बार कहा तुम्हे ये सरकारी नोकरी छोड़ कर प्राइवेट नोकरी क्यों ने करते!!!,में तंग आ गयी तुमसे...जब मेरे लिए ना तुम्हारे पास न वक़्त है ना पैसे तो मुझसे शादी क्यों की??'

'क्या खराबी है इस नोकरी में!मैं इतना ही कमा सकता ह..इसी में खुश रहना सीखो.'

पर वो कुछ सुनने को तैयार ही ने थी. आयेदीन इक नयी फरमाइश कभी कपडे कभी जेवर .
प्राइवेट नोकरी क्या मेरी इंतज़ार में है..में मचेने बनने को तैयार नहीं/

'अच्छा कमा ने सकते..मेरे खर्चे नहीं उठा सकते तो मेरे यहाँ रहने का कोई मतलब ही नहीं'
और रोते ही जो सामान दिखा बैग में जबरजस्ती ठूंस कर दनदनाती हुई आशु को भी मुझसे दूर ले गयी.मैंने रोकने की कोशिश नहीं की ,सोचा गुस्से में है २-४ दिन में लौट आएगी/पर जब तलाक का नोटिस दरवाज़े पर देखा तो आँखों से रुलाई छूट गयी.शादी से अब तक का साथ दीमाग में रील की तरह चलता रहा.सुनीता का ब्याह कर मेरे घर आना....आशु का जन्म ..
मन में उसके जाने से दर्द और कड़वाहट बन गयी थी.उससे बात करने की भी कोशिश की फ़ोन पर .वो बात करने को ही तैयार ने थी.आशु की दूर से ही रोते ही.'.पापा पापा..मुझे ले जाओ '
की आवाज सुने देती रही .पर सुनीता ने फोन पटक दिया
सुबह घंटी बजने से नींद खुली.आशा.कामवाली ही थी...अंदर आ कर पूछी'साब ,मेमसाब अभी तक ने आई?में नाश्ता बना दूँ!'
और में हाँ कह कर बाथरूम में चला गया.नाश्ता कर स्कूटर ले दफ्टर को चल रहा था..की अचानक लाल बत्ती देख ने पाया और कार से जा टकराया.ज़मीन पर गिर पडा और उसके बाद कुछ याद नहीं .होश आया तो अपने आप को अस्पताल में पाया ,बाएं हाथ में हड्डी टूट जाने से दर्द हो उठा .दरवाज़े से सुनीता रोते ही दौड़ी आई.'मुझे माफ़ कर दो'
''अब कयू आई हो .ये देखने की में ज़िंदा ह या नहीं??'
'ऐसा मत कहो ..मुझसे गलती हो गयी..अब से तुमसे कुछ नहीं मंगुंगी ,माफ़ कर दो'और सिसक सिसक के रोने लगी .
मैंने गले से लगा लीया 'भूल जाओ अब सब कुछ ..अब तो छोड़ के ने जाओगी!!!'
'कभी नहीं.'
और में मन मन में भगवान् का शुक्रिया अदा करने लगा.जो होता है अच्छा ही होता है.